बुधवार, 16 सितंबर 2020

जयपुर यात्रा

 जयपुर दर्शन







गुलाबी नगर

आज चलते हैं ऐसी यात्रा पर एक ऐसा शहर जिसे जाना जाता है गुलाबी नगर के नाम से जो राजस्थान की राजधानी है इस शहर को आमेर के राजा सवाई जय सिंह (द्वितीय) ने बसाया था इस शहर की सभी इमारतों का रंग गुलाबी है जो पहले नहीं था सन 1876 मैं वेल्स के राजकुमार के आने के अवसर पर तत्कालीन महाराजा रामसिंह के आदेश पर इस शहर को गुलाबी कलर द्वारा आकर्षक रूप देने की कोशिश की गई तभी से इस शहर का नाम गुलाबी नगरी प्रसिद्ध हो गया इस शहर को सुरक्षित करने के उद्देश्य से चारों ओर से परकोटे का निर्माण करवाया गया है इस शहर को वास्तु के अनुरूप बसाया गया है जिसके सारे रास्ते सीधे और चौड़े है इस शहर के आराध्य हैं गोविंद देव जी 


 हवा महल

  सन 1799 में हवामहल का निर्माण करवाया गया था  यह पांच मंजिली इमारत अर्ध अष्टाकार रूप में बनाई गई है जिसमें 953  खिड़कियां हैं इन खिड़कियों से गुजरने पर हवा ऐसा एहसास देती है जैसे पंखा चल रहा है इस इमारत का निर्माण करवाने का उद्देश्य राजसी स्त्रियों को शहर का दैनिक जीवन और जुलूस दिखाने का था






 

गोविंद देव जी 

 जयपुर का सबसे प्रसिद्ध भगवान कृष्ण का यह मंदिर बिना शिखर का है चंद्र महल के पूर्व में जय निवास के बगीचे के बीच में निर्मित है गोविंद देव जी जयपुर के संरक्षक देवता के रूप में यहां स्थित है गोविंद देव जी की मूर्ति पहले वृंदावन के एक मंदिर में स्थित थी फिर सवाई जयसिंह द्वितीय ने इन्हें यहां अपने परिवार के देवता के रूप में स्थापित किया था 








  जंतर मंतर 

 
 यह जयसिंह की पांच वेधशाला में से सबसे विशाल पत्थर की वेधशाला है इसको वैज्ञानिक ढंग से तैयार किया गया है इसके अंदर पत्थर के बहुत ही जटिल यंत्र है जिनका प्रयोग खगोलीय गणना के लिए किया जाता है इनमें सबसे अधिक प्रभावशाली राम यंत्र है जिसका प्रयोग ऊंचाई मापने के लिए किया जाता है यह वेधशाला विश्व प्रसिद्ध है इसे 2012 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर में शामिल किया था







 सिटी पैलेस

यह पूर्व शाही निवास है यह भूरे संगमरमर के स्तंभों पर टिकी इमारत है इसमें रंगीन पत्थरों पर फूलों की आकृति निर्मित की गई है इसमें एक संग्रहालय भी है जिसमें राजस्थानी और मुगलिया शैली के मिश्रण से तैयार पोशाके और हथियार सुसज्जित है इस के द्वार पर दो संगमरमर के नक्काशीदार हाथी विराजमान है 








गलता तीर्थ 

यह एक प्राचीन तीर्थ स्थल है इसका हरियाली से युक्त प्राकृतिक सौंदर्य इसे और अधिक आनंदमय बनाता है यह तीर्थ स्थल निचली पहाड़ियों के बीच में बना हुआ है यहां एक सूर्यदेव का छोटा मंदिर है जिसे पूरे शहर से देखा जा सकता है यहां पानी का कुण्ड बना हुआ है जिसमें प्राकृतिक रूप से पानी आता है इस कुण्ड में अमावस्या पर स्नान करने करने का बड़ा महत्व है 









आमेर का किला

मावठा झील के पास स्थित इस किले का निर्माण राजा मानसिंह सवाई जयसिंह द्वारा कराया गया है मावठा झील के पास से पैदल और हाथी पर सवार होकर सिंह पोल और जलेब चौक तक पहुंचा जा सकता है चौक से सीढ़ियां किले में स्थित शिला माता के मंदिर तक जाती है शीला माता राज परिवार की कुलदेवी है जिसकी पूजा हजारों श्रद्धालु करते हैं शिला माता की मूर्ति बांग्लादेश के जेसोर से यहां लाई गई थी
 






जल महल

जयपुर से आमेर जाने वाले मार्ग पर स्थित मानसागर झील के मध्य बना हुआ है यह महल,इसका निर्माण राजा जयसिंह ने करवाया था इसके कई तल पानी के अंदर बनाए गए हैं जिससे इस महल में गर्मी नहीं लगती है चांदनी रात में देखने पर झील के मध्य इस महल का दृश्य बड़ा ही मनमोहक लगता है 







रामनिवास बाग

रामनिवास बाग के अंदर चिड़ियाघर है जिसमें हर तरह के जानवर और पक्षी है इसके बाहरी और रामलीला मैदान है जिसमें रामलीला होती हैं और इसके अंदर सामने एक संग्रहालय है जिसका नाम अल्बर्ट हॉल है जिसमें एक ममी (एक बहुत पुरानी इंसानी लाश जिसे कुछ केमिकल युक्त पदार्थ लगा कर बहुत समय तक सुरक्षित रखा जाता है)रखी हुई है









वैसे तो जयपुर बहुत बड़ा है जिसकी संपूर्ण यात्रा वर्णन करना कठिन है हमने इस लेख में कुछ महत्वूर्ण जगहों का ही उल्लेख किया है आशा करते हैं आपको यह लेख अच्छा लगा होगा इसी शुभकामनाओं के साथ आपका हृदय से आभार व्यक्त करते हैं



ऐसी ही अन्य यात्रा वर्णन के लिए आप मेरी यादगार यात्रा पर आ सकते हैं।



शनिवार, 12 सितंबर 2020

महाकालेश्वर यात्रा

  जय श्री महाकाल




                                जय श्री महाकालेश्वर




आज की यात्रा शिप्रा नदी के तट पर बसे उज्जैनी की जिसे अवंतिका भी कहा जाता है जो नगरी है विक्रमादित्य की, जो नगरी है महाकाल की, जहां के राजा है महाकाल उज्जैन नगरी देश के प्रमुख नगरों से रेलवे द्वारा जुड़ी हुई है उज्जैन रेलवे स्टेशन से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर है मंदिर महाकाल का जहां की भस्म आरती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है इस मंदिर को सन 1235 में इल्तुतिश द्वारा विध्वंस करने का प्रयास किया गया था







उज्जैन रेलवे स्टेशन 




महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग 



उज्जैन के राजा स्वयं महाकाल है इसलिए यहां पर कोई राजा या नेता रात को रुक नहीं सकता स्वयं विक्रमादित्य भी रात को यहां नहीं रुकते थे बाबा महाकाल कि जब सवारी निकलती है तो पुलिस टुकड़ी उन्हें सलामी देती है पूजन के बाद कलेक्टर और पुजारी बाबा महाकाल को नगर भ्रमण करवाते हैं यह सवारी विशेष अवसरों पर ही निकलती है 12 ज्योतिर्लिंगों में से यही 1 ज्योतिर्लिंग दक्षिण मुखी है इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का बहुत ज्यादा महत्व है 






 भस्म आरती



पूरे विश्व में यही एक ऐसा स्थान है जहां बाबा का श्रृंगार भस्म से किया जाता है भस्म आरती सुबह 4:00 बजे होती है भस्म आरती के समय बहुत भीड़ होती है भस्म आरती के लिए ऑनलाइन बुकिंग पहले से करवानी पड़ती है भस्म आरती के लिए महिलाओं को साड़ी और पुरुष को सिर्फ एक धोती पहनना अनिवार्य है आप यहां से भस्म आरती की ऑनलाइन बुकिंग कर सकते है, 






भस्म आरती दर्शन 






महाकालेश्वर मंदिर दैनिक पूजा समय




आरती         चैत्र से अश्विन तक         अश्विन से फाल्गुन तक 
                                                                                    भस्म आरती      प्रात:4 बजे                     प्रात:4 बजे    

द्धयोदन            प्रात: 7 बजे                    प्रात: 7 बजे 
 
महा भोग          प्रात: 10 बजे                  प्रात: 10 बजे

संध्या               सांय.5 बजे                     सांय.5 बजे

पुन: संध्या        सांय 7:00 बजे               सांय 7:00 बजे

शयन                रात्री 11 बजे                  रात्रि 11 बजे




नोट_श्रावण मास में भस्म आरती प्रातः 3:00 बजे होती है 





मंगल नाथ मंदिर 



महाकाल मंदिर से लगभग 5 किलोमीटर दूर है मंगल नाथ मंदिर जहां मंगल ग्रह की शांति की पूजा होती है मंगल ग्रह का मानव जीवन से गहरा नाता है मनुष्य की कुंडली में मांगलिक दोष होता है उसकी विशेष पूजा यहां होती है जिसमें पके हुए चावल से पींड बनाकर पूजा की जाती है 




मंगल नाथ दर्शन 




काल भैरव मंदिर



मंगलनाथ मंदिर से थोड़ी दूर स्थित है काल भैरव मंदिर जहां बाबा भैरव मदिरापान करते हैं यहां मदिरा चढ़ाने वाले भक्तों की मनोकामना अवश्य ही पूरी होती है यहां बहुत राजाओं ने अपनी विजय के लिए मन्नते मांगी है और उनकी मन्नते पूरी भी हुई है यहां बाबा काल भैरव को मदिरापान करते हुए देखा जा सकता है जैसे ही मदिरा डाले हुए पात्र को बाबा के मुंह से लगाया जाता है वह पात्र खाली हो जाता है काल भैरव भगवान शिव का क्रोधित स्वरूप है यह मंदिर आश्चर्य चकित करने वाला है 






भैरव बाबा दर्शन  



रामघाट  



शिप्रा के तट पर बना रामघाट अत्यंत ही प्राचीन स्थान है यहां प्रभु श्री राम ने अपने पिता दशरथ जी का पिंडदान किया था यहां से बहने वाली शिप्रा नदी का दृश्य अत्यंत ही मनोरम है जिसका जल अमृत के समान है इसमें स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है पुराणों मेंउल्लेख है कि शिप्रा नदी भगवान विष्णु के शरीर से निकली है जन्म जन्म के पापों से मुक्त होने के लिए यहां स्नान करने का बड़ा महत्व है शाम के समय रामघाट पर होने वाली आरती का दृश्य बड़ा ही मन को मोह लेने वाला होता है 






रामघाट


 हरसिद्धि मंदिर 



 51 शक्तिपीठों में से एक है मां हरसिद्धि का मंदिर  जब भगवान शिव दक्ष प्रजापति के हवन कुंड से माता सती को लेकर जा रहे थे तब उज्जैन के इसी हरसिद्धि मंदिर की पावन जगह पर माता सती की कोहनी गिरी थी मां हरसिद्धि राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी थी  इससे पहले मां हरसिद्धि समुंद्र के बीच एक टापू पर सुशोभित थी विक्रमादित्य माता को यहां लाना चाहते थे  विक्रमादित्य ने 11 बार अपना सिर काटकर माता को चढ़ाया था लेकिन हर बार माता की कृपा से सर वापस आ जाता था इससे प्रसन्न होकर माता ने यहां आने का वचन दिया था यहां माता का स्वरूप प्रसन्न मुद्रा में है यह मंदिर महाकालेश्वर मंदिर से 1 किलोमीटर दूर है 





मां हरसिद्धि दर्शन 




चिंतामन गणेश मंदिर 



महाकालेश्वर मंदिर से करीब 6 किलोमीटर दूर है चिंतामन गणेश जी का मंदिर जहां गणेश जी तीन रूप में विराजमान है चिंतामन इच्छा मन सिद्धिविनायक इस मंदिर की स्थापना स्वयं प्रभु श्रीराम ने की थी मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त इस मंदिर की दीवार पर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं और मन्नत का धागा बांधते हैं इच्छा पूर्ण होने पर दूध दही चावल और नारियल इन में से किसी एक चीज का दान किया जाता है




चिंतामन मंदिर दर्शन 



 आशा करते हैं आपक इस लेख की सभी जानकारी अच्छी लगी होगी
 इसी शुभकामनाओं के साथ आपका हृदय से आभार ।


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शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

वैष्णो देवी यात्रा









जय मां वैष्णो देवी की 



बहुत दिन से सोच रहे थे माता के दरबार जाने के लिए पर कोई संयोग नहीं बन रहा था वो कहते ह ना जिसको माता का बुलावा आता ह वोही भक्त मां के दरबार में दर्शन के लिए जा पाता ह तो ऐसा ही हुआ शायद माता का बुलावा अबकी बार हमारे लिए भी आ गया हम चार दोस्तों ने जाने का मन बनाया और हमने जाने कि तैयारी शुरू कर दी। बैग पैक किया और निकल गए ट्रेन की  टिकट हमने पहले ही बुक कर दी थी जो कंफर्म थी जम्मू तवी  एक्सप्रेस की जो जयपुर से शाम 4:00 बजे चलती है हम 3:00 बजे के करीब जयपुर जंक्शन पर पहुंच गए खाना हमने घर से पैक करवा लिया था 4:00 बजे हमारी ट्रेन चल चुकी थी ट्रेन में भीड़ भी खूब थी पर हमारी सीट कनफर्म थी तो हमे कोई परेशानी नहीं हुई हम बैठ गए अच्छा मज़ा आ रहा था ट्रेन में माता के जयकारे लग रहे थे














रात को 9 बजे हमने खाना खाया और थोड़ी देर बाद हम सो गए मौसम थोड़ा सर्दी का था तो हल्की फुल्की ठंड लग रही पर बहुत अच्छी नींद आयि जो सुबह 8 बजे हमारी नींद खुली जम्मू अभी आने वाला था फिर हाथ मुंह धोया थोड़ी देर में जम्मू तवी स्टेशन आ गया हम स्टेशन से बाहर निकले वहा से हमने कटरा के लिए प्राइवेट टैक्सी ले ली थी वैसे जम्मू से कटरा के लिए बस सेवा भी उपलब्ध ह रास्ता इतना घुमावदार और रोमांच से भरपूर था हम रास्ते का आनंद लेते हुए करीब 2 घंटे बाद कटरा पहुंचे वहा पर हम एक होटल में चले गए जो पहले से बुक किया था वैसे कटरा में रुपए 100 से 5000 तक प्रति व्यक्ति रुकने की व्यवस्था ह कटरा में 12 महीने फूल भीड़ रहती ह  हमने होटल में आराम किया और शाम को 5 बजे हमने कटरा से माता के भवन जाने के लिए अपनी यात्रा शुरू की उससे पहले हमने यात्रा पर्ची काउंटर से यात्रा पर्ची ले ली थी














जो निशुल्क रहती ह फिर हम पैदल ही बाणगंगा चेक पोस्ट पर पहुंच कर पर्ची चेक करवा के आगे निकले बाणगंगा चेक पोस्ट वह जगह है जहां से माता के भवन की चढ़ाई स्टार्ट होती है हम तो पैदल ही जा रहे थे वैसे यहां से घोड़े खच्चर भी जाते हैं जो 1100 से 1500 रू में भवन तक पहुंचा देते ह इसके अलावा पालकी भी जाती ह जिसे 4 लोग लेकर चलते ह जिसका चार्ज 3 से 4 हजार तक हो सकता ह













आगे चलने पर एक प्राकृतिक मनोरम झरने से बहती हुई बाणगंगा नदी ह, कहते ह यहां माता ने अपने केश धोए थे वहा पर हमने स्नान किया झरने का पानी इतना शीतल था जैसे कह रहा था कि आगे कि यात्रा बहुत कठिन ह और यहां स्नान करने के बाद ही बिना थके आगे की यात्रा कर पाओगे फिर वहा से आगे चलने के बाद अर्धकुमारी का मन्दिर आया जिसे गर्भ जून की गुफा भी कहते हैं जहा मां वैष्णो देवी 9 महीने तक रही थी हम वहां थोड़ी देर रुके और विश्राम किया हमारी वहां दर्शन करने की इच्छा थी पर वहां पर बहुत लंबी लाइन लगती है तो टाइम ज्यादा निकल जाता इसलिए हम आगे के लिए निकल गए आगे खड़ी चढ़ाई थी जिसे हाथी माथे की चढ़ाई कहा जाता है ऊपर भवन के करीब पहुंचते-पहुंचते रात्रि 11 के लगभग बज गए थे तो हमने वहां पर रात्रि विश्राम करने का फैसला किया वहां पर श्राइन बोर्ड की बहुत सारी धर्मशालाएं होटल बगैरा है जहां कम से कम चार्ज में आप रह सकते हैं













यहां पर निशुल्क लॉकर रूम की व्यवस्था भी है जहां आप अपना कोई भी सामान रख सकते हैं फिर हमने खाना खाया और थोड़ा वहां पर घूमने के लिए निकल गए रात्रि में भवन की छटा देखने लायक थी और फिर हम सो गए और सुबह 5:00 बजे उठे और नहा धोकर तैयार हुए और भवन के बाहर से श्राइन बोर्ड की खूब सारी दुकानें वहां से हमने प्रसाद लिया और लंबी लाइन में लग गए करीब 1 घंटे बाद हमारा नंबर आया दर्शनों के लिए, हमने वहां माता के दर्शन किए जो  पिंडी रूप में स्थापित है महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती यहां मां स्वयं पिंडी रूप में विराजमान है यहां मां स्वयं प्रकट हुई है भक्तों के संकट दूर करने के लिए और दुख हरने के लिए, सामान्यतः वैष्णो देवी को माता रानी और वैष्णवी के नाम से भी जाना जाता है




 







दर्शन करने के पश्चात हमें मां वैष्णो देवी के आशीर्वाद स्वरुप प्रसाद का पैकेट मिला जिसमें माता की फोटो लगी हुई सिक्के के साथ प्रसाद था दर्शन करने के पश्चात अति आनंद की अनुभूति हुई मानो सब कुछ मिल गया हो और किसी भी चीज की चाहत ना हो।अद्भुत है मां वैष्णो देवी का दरबार बोल सांचे दरबार की जय। वहां से हमने भैरव मंदिर के लिए यात्रा शुरू की मान्यता है कि भैरव मंदिर की यात्रा किए बिना माता वैष्णो देवी की यात्रा का पूर्ण फल नहीं मिलता है हमने भैरव मंदिर पैदल ही जाने का फैसला किया वैसे भवन से भैरव मंदिर तक रोपवे सर्विस शुरू की गई है जिसका किराया एक साइड का ₹100 है फिर हमने भैरव मंदिर के दर्शन किए और वापसी के लिए निकल गए।।।
यह था हमारी वैष्णो देवी यात्रा का वर्णन आशा करते हैं आपको अच्छा लगा होगा ।     








कुछ ध्यान योग्य बातें 


1.माता का दरबार 24घंटे खुला रहता ह
2.कटरा से भवन शराब मांसाहार पूरी तरह प्रतिबंधित है 
3. कटरा से भवन जाने में 5 से 6 घंटे का समय लगता है
4.ज्यादा खाने पीने का सामान ना लेकर जाए पूरे रास्ते में उपलब्ध है
5.यात्रा परची के बिना कोई भी यात्री बाणगंगा चेक पोस्ट पार नहीं कर सकता पर्ची लेने के 6 घंटे के अंदर बाणगंगा चेक पोस्ट पार करना अनिवार्य है यह नियम यात्रियों की सुरक्षा के लिए श्राइन बोर्ड के द्वारा बनाए गए हैं इन नियमों का पालन अवश्य करें 
6. कटरा से सांझी छत तक जाने के लिए हेलीकॉप्टर की सुविधा भी है ज्यादा जानकारी के लिए आप  श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड पर विजिट कर सकते हैं
7.  श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तरफ से जम्मू कटरा अर्ध कुमारी और भवन के नजदीक रहने की अच्छी व्यवस्था की गई है आप श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड से ऑनलाइन रूम बुुुुक कर सकते हैं 



मां वैष्णो देवी सबकी मुरादें पूरी करें बोल सांचे दरबार की जय 



जय माता दी  




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बुधवार, 9 सितंबर 2020

भानगढ़ यात्रा








मै एक दिन सुबह सोया था कि फोन की घंटी बजी टाइम सुबह के 6 बज रहे थे मैने फोन उठाया जो की हमारे एक मित्र का था उनकी इच्छा थी भानगढ़ जाने की मैने भी कभी भानगढ़ देखा नही था और बहुत सुना था भानगढ़ के बारे में तो मैने भी उनको हा कह दी और उन्होंने आने की बोल कर फोन कट कर दिया फिर में उठा और तेयार होने लगा लगभग 8 बजे के करीब वो घर पर आ गए और हम साढ़े आठ बजे रवाना हो गए मौसम बड़ा सुहाना हो रहा था हल्की फुल्की बारिश भी हो रही थी हम जमवा रामगढ़ होते हुए ऐसे ही बाते करते हुए जा रहे थे।














सुबह घर से कुछ खाकर भी नहीं निकले तो भूख भी लग रही थी भानगढ़ भी अब ज्यादा दूर नहीं था तो मैने उनसे कहा कि कोई रेसटोरेंट् दिखे तो गाड़ी रोक लेना फिर उन्होंने  एक रेसटोरेंट के पास गाड़ी रोक दी रेसटोरेंट् ज्यादा बड़ा तो नहीं था फिर भी काम चलाने लायक था हमने वहां से प्याज की कचोरी ली कडी के साथ जो इतनी स्वादिष्ट लगी जो में यहां बयान नहीं कर सकता फिर उसी रेस्टोरेंट से हमने पकोड़े पैक करवा लिए और पानी की बोतल भी साथ में ले ली और हम आगे बढ़े जो कि कच्चा रास्ता था।















 थोड़ा आगे जाने पर बाई तरफ एक हनुमान जी का मंदिर था और दाई तरफ एक छतरी टाईप में कुछ बना हुआ था फिर हमने वहां गाड़ी रोक दी और वहा स्थानीय लोगों से बातचीत करने से पता चला कि भानगढ़ में रहने वाली मृत आत्मा उस हनुमान जी के मन्दिर से आगे नहीं आती ह और शाम को 6 बजे के बाद कोई भी इंसान हनुमान जी के मन्दिर से आगे नहीं जा सकता है अभी तो 11 बजे थे तो हम आगे चले, आगे चलने पर एक लोहे का बड़ा सा गेट था हम गेट से अंदर चले गए ।














अंदर बाई साइड में एक पार्क सा बना था और दाई साइड ऊंची दीवार के ऊपर एक मन्दिर बना था बीच में रास्ता था जिसके दोनों तरफ जैसे कोई बाज़ार हो ऐसे दुकानें टाईप कुछ बनी थी जो खंडहर जैसी हालत में थी पूछने पर पता चला कि पहले जयपुर यही था फिर उजड़ गया था इसके बाद में जयपुर दुबारा से नया बसाया गया था उजड़ने के बारे में बहुत सारी सच्ची कहानियां प्रचलित ह जिसमें से एक तो यह ह की भानगढ़ की राजकुमारी पर एक तांत्रिक का मन डोल गया था।













 तो उसने एक इत्र कि शीशी पर काला जादू करके राजकुमारी की दासी को दे दी और उससे कहा कि इसको राजकुमारी के ऊपर छिड़क देने से राजकुमारी मोहित हो कर मेरे पास दोड़ी आएगी जब दासी ने वो इत्र की शीशी राजकुमारी को दी तो राजकुमारी ने गुस्से में उस शीशी को एक बड़ी चट्टान पर फेंक कर मारा जिससे वो चट्टान मोहित हो कर तांत्रिक के पीछे भागने लगी जिससे तांत्रिक वहा से भागने लगा फिर उस तांत्रिक ने भानगढ़ को श्राप दिया कि यह नगर कभी बस नहीं पाएगा और उजड़ जाएगा तभी से भानगढ़ कभी बसा नहीं ह फिर थोड़ा आगे जाने पर बाई साइड एक पानी का कुंड था जहा कुछ स्थानीय युवक नहा रहे थे और कुंड के पास में ही एक बरगद का बहुत ही पुराना पेड़ था जिसकी लताओ को पकड़ कर कुछ युवक कुंड में कूद रहे थे ।
















पूछने पर पता चला कि ये कुंड तभी से ह और राजपरिवार के सभी लोग यहां स्नान करने के लिए आते थे फिर हम आगे गए तो सामने हमे एक किले का दरवाजा दिखा जो अपनी 16 वी शताब्दी से उजड़ी हुई विरासत की कहानी बयान कर रहा था फिर हम किले के अंदर गए जो तीन मंजिल का बहुत बड़ा किला था जो बहुत ही खंडहर हालत में था हम किले के ऊपर गए उसकी दीवार जगह जगह से टूटी हुई थी और छत पर पेड़ पोधे उगे हुए थे और एक साइड तो छत गिरी हुई भी थी हम किले के अंदर 1 घंटे तक रहे और किले और वहा रहने वाले लोगों के बारे में बाते करते रहे फिर हम किले के बाहर आ गए और बाहर खुला मैदान था जिसमें दूब लगी हुई थी।














हम वहा बैठ गए और साथ में लाए पकोड़े का आनंद उठाने लगे बाते करते करते और घूमते हुए पता ही नहीं चला कि शाम के 5 बज गए थे वहा से लोग भी धीरे धीरे जाने लगे थे फिर वहा एक आदमी आया और उसने बताया कि किला अब बंद होने वाला ह तो आप लोग भी जाओ फिर हम बाहर आ गए और हनुमान जी के  मन्दिर के पास एक चबूतरा बना था वहा आकर बैठ गए और वहा के लोगो से बात चीत करने लगे फिर 6 बजे किले का गेट बन्द हो गया और हम भी वहा से निकल गए और रात को घर पहुंचते पहुंचते 9
बज गए घर आकर खाना खाया और भानगढ़ के बारे में सोचते हुए कब आंख लग गई पता ही नहीं चला!!!













आशा करते हैं यह लेख आपको अच्छा लगा होगा इसी शुभकामनाओं के साथ आपका हृदय से आभार व्यक्त करते हैं 





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मंगलवार, 8 सितंबर 2020

एक रात जंगल में







एक बार हम रात को नौ बजे जंगल में पहुंचे थोड़ी दूर हम चले तो पीछे से डरावनी आवाजे आने लगी तो हमने पीछे मूड कर देखा तो हमे कोई नहीं दिखा सिर्फ और सिर्फ अंधकार ही अंधकार था चारों तरफ फिर हम घबरा गए फिर हम थोड़ा और आगे चले तो हम एक पेड़ पर कुछ लटका हुआ दिखा हम पास में जाते हुए बहुत डर लग रहा था पास में जाने की हिममत ही नहीं हो रही थी जैसे तैसे करके हम थोड़ा पेड़ के पास पहुंचे अचानक हवाओं की तेज तेज आवाज आने लगी फिर हमे वहां से थोड़ी दूर भागाना पड़ा।











फिर अचानक से काली बिल्ली हमारे पास में आ गई जो हमारी तरफ अपनी लाल आंखो से घुर रही थी तो हमे बहुत डर लगने लगा फिर जोर जोर से चमगादड़ों की आवाजे आने लगी मन बहुत घबरा रहा था हाथ कांप रहे थे फिर अचानक ही घड़ी पर नजर गई तो रात के 12 बजने में 3मिनट थे फिर अचानक से एक मरा हुआ चूहा उपर से गिरा फिर जैसे ही चूहा गिरा बिल्ली ने जोर से झपट्टा मारा और चूहे को लेकर भाग गई हमारी जान में जान आयी फिर अचानक से ही कुत्तों के रोने की आवाजे आने लगी फिर हम थोड़ा डरते हुए आगे बढ़ने लगे बहुत जोर से दिल घबरा रहा था फिर सामने से हमे 2 आंखे चमकती हुई दिखी।











 हम डरते हुए उसके पास जाने लगे हमारे पैर कांप रहे थे फिर जैसे तैसे हम उसके पास पहुंचे तो एक खरगोश दिखा जो हमसे डर के दुबका हुआ था फिर हमारे पास में जाते ही वो भाग गया फिर हम थोड़ा और आगे बढ़े तो जोरदार तूफानी हवाओं के साथ बिजली चमकने लगी और मूसलाधार बारिश होने लगी तो हम एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए फिर अचानक से किसी ने कंधे पर हाथ रखा हमारी तो जैसे धड़कन ही रुक गई फिर किसी ने कहा बीड़ी ह क्या हमारी तो पीछे मुड़ कर देखने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी फिर वही आवाज कानों में सुनाई दी बीड़ी ह क्या फिर हिम्मत करके पीछे पलट कर देखा तो एक 60.65 साल का बुजुर्ग आदमी था।












उसके हाथ में कुल्हाड़ी थी हम तो सकपका गए फिर उसने दुबारा बोला बीड़ी ह क्या हमने कहा नहीं ह तो वो जाने लगा फिर उसके थोड़ी दूर जाने पर हमने उसको आवाज दी तो वो रुक गया हम उसके पास गए और पूछा की इस बियाबान जंगल में इतनी रात को आप क्या कर रहे ह तो उसने कहा कि में यही पास में रहता हूं उसकी झोपडी के पास कोई जंगली जानवर आ गया था वो उसको भगाने के लिए आया था फिर उसने हमसे कहा कि तुम यहां क्या कर रहे हो यहां से चले जाओ यहां बहुत खतरा ह फिर हम उसी आदमी के साथ उसकी झोपडी में आ गए और सो गए सुबह जब हमारी नींद खुली तो सुबह के 9 बज रहे थे फिर हम घर आ गए !!!!





यह लेख मनोरंजन के उद्देश्य से बनाया गया है आशा करते हैं आपको अच्छा लगा होगा इसी शुभकामनाओं के साथ आपका हृदय से आभार 




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जयपुर यात्रा

 जयपुर दर्शन गुलाबी नगर आज चलते हैं ऐसी यात्रा पर एक ऐसा शहर जिसे जाना जाता है गुलाबी नगर के नाम से जो राजस्थान की राजधानी है इस शहर को आमेर...