बुधवार, 9 सितंबर 2020

भानगढ़ यात्रा








मै एक दिन सुबह सोया था कि फोन की घंटी बजी टाइम सुबह के 6 बज रहे थे मैने फोन उठाया जो की हमारे एक मित्र का था उनकी इच्छा थी भानगढ़ जाने की मैने भी कभी भानगढ़ देखा नही था और बहुत सुना था भानगढ़ के बारे में तो मैने भी उनको हा कह दी और उन्होंने आने की बोल कर फोन कट कर दिया फिर में उठा और तेयार होने लगा लगभग 8 बजे के करीब वो घर पर आ गए और हम साढ़े आठ बजे रवाना हो गए मौसम बड़ा सुहाना हो रहा था हल्की फुल्की बारिश भी हो रही थी हम जमवा रामगढ़ होते हुए ऐसे ही बाते करते हुए जा रहे थे।














सुबह घर से कुछ खाकर भी नहीं निकले तो भूख भी लग रही थी भानगढ़ भी अब ज्यादा दूर नहीं था तो मैने उनसे कहा कि कोई रेसटोरेंट् दिखे तो गाड़ी रोक लेना फिर उन्होंने  एक रेसटोरेंट के पास गाड़ी रोक दी रेसटोरेंट् ज्यादा बड़ा तो नहीं था फिर भी काम चलाने लायक था हमने वहां से प्याज की कचोरी ली कडी के साथ जो इतनी स्वादिष्ट लगी जो में यहां बयान नहीं कर सकता फिर उसी रेस्टोरेंट से हमने पकोड़े पैक करवा लिए और पानी की बोतल भी साथ में ले ली और हम आगे बढ़े जो कि कच्चा रास्ता था।















 थोड़ा आगे जाने पर बाई तरफ एक हनुमान जी का मंदिर था और दाई तरफ एक छतरी टाईप में कुछ बना हुआ था फिर हमने वहां गाड़ी रोक दी और वहा स्थानीय लोगों से बातचीत करने से पता चला कि भानगढ़ में रहने वाली मृत आत्मा उस हनुमान जी के मन्दिर से आगे नहीं आती ह और शाम को 6 बजे के बाद कोई भी इंसान हनुमान जी के मन्दिर से आगे नहीं जा सकता है अभी तो 11 बजे थे तो हम आगे चले, आगे चलने पर एक लोहे का बड़ा सा गेट था हम गेट से अंदर चले गए ।














अंदर बाई साइड में एक पार्क सा बना था और दाई साइड ऊंची दीवार के ऊपर एक मन्दिर बना था बीच में रास्ता था जिसके दोनों तरफ जैसे कोई बाज़ार हो ऐसे दुकानें टाईप कुछ बनी थी जो खंडहर जैसी हालत में थी पूछने पर पता चला कि पहले जयपुर यही था फिर उजड़ गया था इसके बाद में जयपुर दुबारा से नया बसाया गया था उजड़ने के बारे में बहुत सारी सच्ची कहानियां प्रचलित ह जिसमें से एक तो यह ह की भानगढ़ की राजकुमारी पर एक तांत्रिक का मन डोल गया था।













 तो उसने एक इत्र कि शीशी पर काला जादू करके राजकुमारी की दासी को दे दी और उससे कहा कि इसको राजकुमारी के ऊपर छिड़क देने से राजकुमारी मोहित हो कर मेरे पास दोड़ी आएगी जब दासी ने वो इत्र की शीशी राजकुमारी को दी तो राजकुमारी ने गुस्से में उस शीशी को एक बड़ी चट्टान पर फेंक कर मारा जिससे वो चट्टान मोहित हो कर तांत्रिक के पीछे भागने लगी जिससे तांत्रिक वहा से भागने लगा फिर उस तांत्रिक ने भानगढ़ को श्राप दिया कि यह नगर कभी बस नहीं पाएगा और उजड़ जाएगा तभी से भानगढ़ कभी बसा नहीं ह फिर थोड़ा आगे जाने पर बाई साइड एक पानी का कुंड था जहा कुछ स्थानीय युवक नहा रहे थे और कुंड के पास में ही एक बरगद का बहुत ही पुराना पेड़ था जिसकी लताओ को पकड़ कर कुछ युवक कुंड में कूद रहे थे ।
















पूछने पर पता चला कि ये कुंड तभी से ह और राजपरिवार के सभी लोग यहां स्नान करने के लिए आते थे फिर हम आगे गए तो सामने हमे एक किले का दरवाजा दिखा जो अपनी 16 वी शताब्दी से उजड़ी हुई विरासत की कहानी बयान कर रहा था फिर हम किले के अंदर गए जो तीन मंजिल का बहुत बड़ा किला था जो बहुत ही खंडहर हालत में था हम किले के ऊपर गए उसकी दीवार जगह जगह से टूटी हुई थी और छत पर पेड़ पोधे उगे हुए थे और एक साइड तो छत गिरी हुई भी थी हम किले के अंदर 1 घंटे तक रहे और किले और वहा रहने वाले लोगों के बारे में बाते करते रहे फिर हम किले के बाहर आ गए और बाहर खुला मैदान था जिसमें दूब लगी हुई थी।














हम वहा बैठ गए और साथ में लाए पकोड़े का आनंद उठाने लगे बाते करते करते और घूमते हुए पता ही नहीं चला कि शाम के 5 बज गए थे वहा से लोग भी धीरे धीरे जाने लगे थे फिर वहा एक आदमी आया और उसने बताया कि किला अब बंद होने वाला ह तो आप लोग भी जाओ फिर हम बाहर आ गए और हनुमान जी के  मन्दिर के पास एक चबूतरा बना था वहा आकर बैठ गए और वहा के लोगो से बात चीत करने लगे फिर 6 बजे किले का गेट बन्द हो गया और हम भी वहा से निकल गए और रात को घर पहुंचते पहुंचते 9
बज गए घर आकर खाना खाया और भानगढ़ के बारे में सोचते हुए कब आंख लग गई पता ही नहीं चला!!!













आशा करते हैं यह लेख आपको अच्छा लगा होगा इसी शुभकामनाओं के साथ आपका हृदय से आभार व्यक्त करते हैं 





ऐसे ही अन्य यात्रा वर्णन के लिए आप मेरी यादगार यात्रा पर आ सकते हैं 









1 टिप्पणी:

जयपुर यात्रा

 जयपुर दर्शन गुलाबी नगर आज चलते हैं ऐसी यात्रा पर एक ऐसा शहर जिसे जाना जाता है गुलाबी नगर के नाम से जो राजस्थान की राजधानी है इस शहर को आमेर...